21-Nov-2019

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मल्लिकार्जुन खड़गे: जिन्होंने हर चुनाव जीता, वो 2019 में कांग्रेस के गढ़ से क्यों हार गए...

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मोदी लहर ने कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस को भारी नुकसान पहुंचाया. बीजेपी ने कर्नाटक की कुल 28 में से 25 सीटें झटक लीं. कांग्रेस और जेडीएस को सिर्फ एक-एक सीट पर ही संतोष करना पड़ा. कर्नाटक में कांग्रेस की इतनी बुरी हालत हुई कि मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे दिग्गज नेता, जिन्होंने अपने पूरे कॅरियर में हार नहीं देखी थी, उन्हें भी अब इसका सामना करना पड़ा. बीजेपी उम्मीदवार उमेश जाधव ने खड़गे को 95,452 वोटों से शिकस्त दी. उमेश जाधव को कुल 6 लाख 20 हजार 192 वोट हासिल हुए जबकि खड़गे को 5 लाख 24 हजार 740 वोट मिले.

1972 से लेकर अब तक मल्लिकार्जुन खड़गे 9 बार लगातार विधायक रहे, दो बार सांसद चुने गए लेकिन 2019 में चली मोदी लहर ने उन्हें भी उखाड़ फेंका. कर्नाटक की गुलबर्गा सीट, जिसे कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, वहां से दिग्गज कांग्रेसी की हार के मायने बड़े हैं.

1972 से लगातार जीत रहे खड़गे के कॅरियर को लगा ब्रेक
कर्नाटक की गुलबर्गा सीट अनुसूचित जाति की सुरक्षित सीट है. यहां की कुल आबादी में एक चौथाई हिस्सा अनुसूचित जाति का है. करीब 3 फीसदी आबादी अनुसूचित जनजाति की है. मल्लिकार्जुन खड़गे पहली बार 2009 में इस सीट से चुनाव लड़े और जीत हासिल की. इसके पहले वो 1972 से लेकर 2008 तक लगातार विधानसभा का चुनाव जीतते रहे. कांग्रेस उनकी भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में देख रही थी. इसलिए उन्हें लोकसभा चुनाव में उतारा गया.

2014 के मोदी लहर में भी वो अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे थे. गुलबर्गा सीट से उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार रेवुनायक बेलामागी को 74,733 वोटों से हराया था. सिर्फ 44 सांसदों वाली कांग्रेस ने उन्हें लोकसभा में पार्टी का नेता बनाया. 2014 के बाद उन्होंने मोदी विरोध का झंडा बुलंद रखा. कई मौकों पर उन्होंने पीएम मोदी और केंद्र की एनडीए सरकार की नीतियों की सख्त लहजे में आलोचना की.

लोकसभा में हुई कई बहस के दौरान भी उन्होंने तीखे तेवर में बीजेपी पर हमले किए. उनकी भूमिका कांग्रेस के अग्रणी नेताओं में हो चुकी थी. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव ने उनके राजनीतिक कॅरियर को सबसे बड़ा झटका दिया. हालांकि इस हार के पीछे कांग्रेस के अंतर्विरोध का ही हाथ रहा.

अंदरूनी विरोधाभास बना हार की वजह

खड़गे की हार के लिए कांग्रेस का अंदरुनी विरोधाभास ही जिम्मेदार है. कांग्रेस अपने विधायकों-नेताओं को एकजुट नहीं रख पाई. जिसका खामियाजा कर्नाटक में हार के साथ मल्लिकार्जुन खड़गे को अपनी सीट गंवाकर उठाना पड़ा. मल्लिकार्जुन खड़गे के खिलाफ बीजेपी उम्मीदवार उमेश जाधव कांग्रेस के ही विधायक थे. जाधव कुछ महीने पहले ही विधानसभा की सदस्यता छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे. कांग्रेस के 4 विधायकों के बागी होकर बीजेपी में शामिल होने का राजनीतिक ड्रामा काफी दिनों तक चला था.

कांग्रेस के रमेश जरकीहोली, बी नागेंद्र और महेश कुमाथली के साथ उमेश जाधव ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी थी. उन्होंने कर्नाटक विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. जबकि कांग्रेस पार्टी ने दलबदल कानून का हवाला देकर स्पीकर से इनकी सदस्यता रद्द करने की मांग की थी. कांग्रेस का कहना था कि दल-बदल कानून के तहत सदस्यता रद्द करने का मामला लंबित है इसलिए इनके इस्तीफे स्वीकार नहीं होने चाहिए.

हालांकि स्पीकर ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद उनके इस्तीफे स्वीकार कर लिए थे. उमेश जाधव ने आरोप लगाए थे कि उनके विधानसभा क्षेत्र में विकास के कार्य नहीं हो पा रहे हैं. इसके पीछे उन्होंने राज्य की कांग्रेस-जेडीएस की सरकार को जिम्मेदार ठहराया था. चुनावों से ठीक पहले मार्च में उमेश जाधव ने बीजेपी ज्वाइन कर ली. उसी समय ये साफ हो गया था कि वो गुलबर्गा सीट से मल्लिकार्जुन खड़गे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले हैं.

फिर बदल गया राजनीतिक समीकरण
उमेश जाधव के चुनावी मैदान में उतरते ही इलाके का राजीनीतिक समीकरण बदल गया. मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए मुकाबला आसान नहीं रह गया था. जाधव के साथ बाबूराव चिंचनसुर, मल्का रेड्डी और मलिकय्या गुट्टेदार जैसे सीनियर नेताओं ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था. ये सभी इलाके में असरदार नेता के तौर पर जाने जाते हैं. ये सभी गुलबर्गा लोकसभा सीट पर मल्लिकार्जुन खड़गे और उनके बेटे प्रियांक खड़गे के प्रभुत्व से परेशान थे. इन सभी नेताओं ने मिलकर दोनों का असर कम करने के लिए ग्राउंड लेवल पर मेहनत की.

उमेश जाधव बंजारा समुदाय से आते हैं. इस समुदाय का उन्हें पूरा समर्थन मिला. गुलबर्गा सीट पर कांग्रेस के समर्थन वाले सभी समीकरण ध्वस्त हो गए. जिसकी वजह से मल्लिकार्जुन खड़गे को अपनी लोकसभा सीट खोनी पड़ी.

साभार- न्‍यूज 18

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