20-Nov-2018

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सिंहस्थ में बरसा धर्म, आध्यात्म, आस्था और विश्वास का अमृत

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सदी के दूसरे सिंहस्थ के अंतिम शाही स्नान में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

मोक्षदायिनी क्षिप्रा में लगाई आस्था और विश्वास की डुबकियाँ

शैव और वैष्णव अखाड़ों का स्नान देख अलौकिक आनंद से सरोबार हुए श्रद्धालु

क्षिप्रा तट पर आस्था और विश्वास का उद्भुत नजारा

सिंहस्थ में करोड़ों श्रद्धालुओं ने लिया धर्म लाभ

वैशाख पूर्णिमा पर उज्जैन सिंहस्थ महाकुंभ में मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदी के पवित्र जल में 13 अखाड़ों का शाही स्नान सम्पन्न हुआ। सदी के दूसरे सिंहस्थ के तीसरे व अंतिम शाही स्नान के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। अंतिम शाही स्नान के साथ ही सिंहस्थ महापर्व का महाआयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस अंतिम शाही स्नान में सर्व प्रथम श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े के पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर श्री अवधेशानंद जी के नेतृत्व में हजारों नागा साधुओं ने क्षिप्रा में आस्था और विश्वास की डुबकियाँ लगाई। जैसे ही सुबह 3 बजे का समय हुआ नागा साधुओं का दल तेजी से क्षिप्रा घाट पर आया और हर-हर महादेव, जय महाकाल, क्षिप्रा मैया की जय हो आदि उदघोष के साथ पावन सलिला के जल में कूद पड़े।

अमृत स्नान में साधु सन्यासियों के हर-हर महादेव, जय क्षिप्रा मैया के नारों से क्षिप्रा तट गुंजायमान हो उठा। एक ओर जहाँ दत्त अखाड़ा घाट पर शैव अखाड़ों के नागा सन्यासी क्षिप्रा में डुबकी लगाकर शाही स्नान में अमृतपान कर रहे थे वहीं रामघाट पर जय सियाराम, जय-जय सियाराम, जय श्रीराम के उदघोष के साथ वैष्णव अखाड़ों के साधु संत भी क्षिप्रा में डुबकियाँ लगाते देखे जा रहे थे। क्षिप्रा के दोनों तट पर एक साथ साधु सन्यासियों को उत्साहपूर्वक क्षिप्रा में डुबकी लगाकर अमृतपान करते हुए अलौकिक नजारा देखते ही बन रहा था। क्षिप्रा तट पर शाही स्नान के दौरान लोगों को अलौकिक आनंद की अनुभूति हो रही थी। श्रद्धालुओं ने धर्म, आध्यात्म, आस्था और विश्वास का ऐसा अदभुत नजारा जीवन में बहुत कम देखने को मिलता है। यही कारण है कि लाखों श्रद्धालु इस क्षण का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे और जैसे ही उन्होंने यह नजारा देखा उसे अपने मोबाइल कैमरे में कैद करने लग गए। उल्लेखनीय है कि सिंहस्थ अवधि के दौरान करोड़ों श्रद्धालुओं ने उज्जैन पहुँचकर धर्मलाभ लिया है।

श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े के साथ-साथ आव्हान और अग्नि तथा निरंजनी एवं आनंद अखाड़ों ने भी अपने-अपने महामंडलेश्वर श्रीमहंतो ओंर साधु संतो के साथ दत्त अखाड़ा घाट पर स्नान का पुण्य अर्जित किया। इसके बाद महानिर्वाणी, पंच अटल अखाड़ों के साधु सन्यासियों का स्नान हुआ। इसी समय रामघाट पर वैष्णव अखाड़ों का शाही स्नान भी चल रहा था। दूधिया रोशनी में नहाये घाट और क्षिप्रा के जल में साधुओं को डुबकियाँ लगाते देखकर श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो कर आस्था एवं श्रद्धा के साथ उन्हें निहार रहे थे। एक तरफ दत्त अखाड़ा पर शैव अखाड़ों का स्नान हो रहा था तो दूसरी ओर रामघाट पर वैष्णव अखाड़ों का स्नान हो रहा था। रामघाट पर निर्वाणी अणि अखाड़ा, दिगम्बर अणि अखाड़ा और निर्मोही अणि अखाड़े के साधु संतों ने स्नान किया। तत्पश्चात श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा, श्री पंचायती नया उदासीन अखाड़ा एवं निर्मल अखाड़े के साधु-संत, श्रीमहन्त, महामण्डलेश्वरों ने जुलूस के रूप में रामघाट पहुँचकर स्नान किया। स्नान के लिए दोनों ओर साधु-संत, हाथी, घोड़े, ऊंट और रथ व बग्घियों पर सवार होकर आन-बान-शान से बैण्ड बाजों के साथ शंखनाद करते हुए क्षिप्रा तट पर पहुँचे। बारह वर्ष में होने वाले इस आयोजन के साक्षी लाखों श्रद्धालु बने।

शैव अखाड़ों का शाही स्नान

श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा, आवाहन अखाड़ा एवं अग्नि अखाड़े का जुलूस अपनी छावनी से रवाना होकर छोटी रपट पर पहुँचकर स्नान कर दत्त अखाड़ा के समीप बने रेम्प से अपने कैम्प में पहुँचा। निरंजनी अखाड़े एवं आनंद अखाड़े का जुलूस बड़नगर रोड स्थित शिविर से रवाना होकर छोटी रपट होते हुए बाएँ चलने के सिद्धांत का पालन करते हुए रोड डिवाइडर के बांइ तरफ जाकर खड़े हो गए तथा निरंजनी अखाड़े के जुलूस के वापस होने के तुरंत बाद दत्त अखाड़ा में प्रवेश कर यहाँ स्नान के बाद अखाड़ा घाट खाली कर डिवाइडर के दूसरी ओर होते हुए बड़नगर रोड पर शंकराचार्य चौराहे होते हुए वापस अपनी छावनी में पहुँचा। महानिर्वाणी एवं अटल अखाड़े का जुलूस बड़नगर रोड स्थित कैम्प से रवाना होकर छोटी रपट पर दत्त अखाड़ा घाट के समीप लगे रोड डिवाइडर के बांई ओर आकर खड़ा हुआ और दत्त अखाड़ा घाट खाली होते ही घाट पर प्रवेश किया और स्नान के बाद डिवाइडर के दूसरी तरफ सड़क के बाएँ चलने के सिद्धांत का पालन करते हुए वापस अपनी छावनी के लिए रवाना हो गया।

श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा एवं पंच अटल अखाड़ा- श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा एवं पंच अटल अखाड़ा बड़नगर रोड छावनी से शंकराचार्य चौक होते हुए छोटी रपट, केदारघाट एवं दत्त अखाड़ा घाट पहुँचकर स्नान किया और पुन: इसी मार्ग से छावनी की ओर रवाना हुआ।

वैष्णव अखाड़ों का स्नान

रामघाट पर क्रमश: पंच निर्मोही अणि अखाड़ा, श्री दिगम्बर अणि अखाड़ा एवं श्री पंच निर्वाणी अणि अखाड़ों का स्नान भी प्रात: 3 बजे से प्रारंभ हुआ। यह अखाड़े खाक चौक से अंकपात, पटेल नगर, निकास चौराहा, कंठाल, सतीगेट, छत्रीचौक, पटनी बाजार, गुदरी चौराहा, रामानुज कोट होते हुए बैण्ड-बाजों व ढोल ढमाकों के साथ रामधुन एवं भजनों की स्वरलहरियों के साथ रामघाट पर पहुँचे। यहाँ स्नान के बाद ये अखाड़े वापस गंधर्व गेट से दानीगेट, बिलोटीपुरा, जूना सोमवारिया, वाल्मिकीधाम के सामने से पीपलीनाका, अंकपात मार्ग होते हुए अपनी छावनी के लिए रवाना हुए।

उदासीन अखाड़ों का स्नान

बड़ा उदासीन अखाड़ा अपने शिविर के सामने से राजपूत धर्मशाला से दानीगेट मोड़ की धर्मशाला गनगौर दरवाजा होते हुए रामघाट पर प्रवेश किया। नया उदासीन अखाड़े ने अपने शिविर से रवाना होकर शंकराचार्य तिराहा छोटी रपट होकर रामघाट पर प्रवेश किया। दोनों अखाड़े स्नान के बाद उक्त तय मार्ग से वापस अपनी छावनी के लिए रवाना हुए।

निर्मल अखाड़ा अपने शिविर से रवाना होकर छोटी रपट पर रोड डिवाइडर के सेवादल शिविर के पास आकर खड़ा हुआ तथा नया उदासीन अखाड़े के वापस निकल जाने के बाद वहाँ से रवाना होकर घाट पर पहुँचा और स्नान के बाद वापस इसी मार्ग से अपने शिविर की ओर रवाना हुआ।

शाही स्नान में अखाड़ों के सभी महामण्डलेश्वर एवं खालसों ने शामिल होकर अपने अखाड़ों के साथ स्नान किया। अखाड़ों के लिए निर्धारित समय में रामघाट व दत्त अखाड़ा घाट पर आम श्रद्धालुओं का स्नान के लिए प्रवेश प्रतिबंधित रहा। अखाड़ों के स्नान के बाद ही आम श्रद्धालु इन घाटों पर स्नान के लिए पहुंचना शुरू हो गए और देखते ही देखते रामघाट, दत्त अखाड़ा घाट, नृसिंह घाट, वाल्मिकी घाट, सुनहरी घाट, गऊघाट आदि सभी घाटों पर आस्था और विश्वास का जन सैलाब शाही स्नान में अमृतपान के लिए उमड़ पड़ा। आस्था और विश्वास का यह नजारा देखते ही बन रहा था। सदी के दूसरे सिंहस्थ की सम्पूर्ण अवधि में करोड़ों श्रद्धालुओं ने उज्जैन पहुँचकर मोक्षदायिनी क्षिप्रा में डुबकियां लगाई। सिंहस्थ महापर्व का यह आयोजन पूर्णत: सफल रहा।

मोक्ष के लिए क्षिप्रा स्नान

सदी के दूसरे सिंहस्थ के तीसरे व अंतिम शाही स्नान में तड़के से ही दत्त अखाड़ा घाट, रामघाट, नृसिंह घाट, सुनहरी घाट सहित अन्य घाटों पर लाखों श्रद्धालुओं ने स्नान पर्व का लाभ लेते हुए मां क्षिप्रा के पवित्र जल में डुबकियां लगाई। माना जाता है कि अमृत की चाह में देव दानवों में हुए संघर्ष के दौरान अमृत कलश से कुछ बूंदे हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन और नासिक की नदियों में छलक गई थी। इसी की स्मृति में प्रत्येक बारह वर्ष बाद इन स्थानों पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है। ग्रहों की स्थिति के अनुसार गुरु जब सिंह राशि में होते हैं और मेष राशि में सूर्य होता है तब उज्जैन में सिंहस्थ होता है। जानकार उज्जैन सिंहस्थ का इसलिए अधिक महत्व देते हैं कि यहां पर क्षिप्रा में स्नान करने से मोक्ष प्राप्त होता है। क्षिप्रा को मोक्षदायिनी नदी माना गया है। वैशाख पूर्णिमा के अवसर पर उज्जैन में लाखों लोगों ने शाही स्नान के दिन मोक्ष की चाह में डुबकी लगाकर पुण्य अर्जित किया।

झलकियॉं

    शैव तथा वैष्णव अखाड़ों ने क्रमश: दत्त अखाड़ा और राम घाट पर समानान्तर रूप से एक समय में स्नान किया।

    सर्वप्रथम जूना अखाड़ा ने प्रात: तीन बजे दत्त अखाड़ा पर स्नान आरंभ किया।

    सजे हुए हाथी के साथ आया जूना अखाड़ा का जुलूस, डमरू, दुंदभी, घंटी तथा शंख की ध्वनी से गुंजायमान हुआ सिंहस्थ।

    स्नान के समय साधुगण उत्साह, उमंग तथा उल्लास से सराबोर थे। साधुगण ने क्षिप्रा में लगे बैरीकेट्स पर खड़े होकर डमरू बजाया और हर-हर महादेव का उदघोष किया।

    पुण्य सलिला क्षिप्रा में लगाये गये प्रकाशमान फुव्वारों पर खड़े होकर साधुगण ने नदी तथा फुव्वारा स्नान का आनंद उठाया।

    प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा फोटो प्रतियोगिता की घोषणा के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में युवा, शाही-स्नान की फोटो लेने के लिए आतुर थे।

    जूना पीठाधीश्वर महामण्डेलश्वर स्वामी अवधेशानंद जी के छत्र के साथ आगमन के बाद फोटो-वीडियो लेने के लिए होड़ लग गई।

    बड़ी-बड़ी जटायें, धूनी रमाये और माथे पर त्रिपुंड लगाये अद्भुत जीवन-शैली वाले नागा साधुओं को अपने कैमरे में कैद करने के लिए देशी एवं विदेशी छायाकार आतुर बने रहे।

    शाही-स्नान के समय साधुगण भारतमाता-धरती मैय्या और क्षिप्रा मैय्या की जय के भी नारे लगा रहे थे।

    शाही-स्नान में कई महिला-पुरूषों ने गेरूआ वस्त्र पहनकर पुण्य स्नान किया।

                                                                                                संदीप कपूर/हितेन्द्र भदौरिया/जगदीश मालवीय


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