18-Dec-2018

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महाकाल की नगरी में पधारे भगवान पशुपतिनाथ

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सिंहस्थ में आ रहे श्रद्धालु, जो समयाभाव या अन्य कारणों से मंदसौर नहीं जा सकते, उज्जैन में ही भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन का पुण्य लाभ प्राप्त कर रहे हैं। भारत में सिर्फ मंदसौर में प्रतिष्ठापित भगवान पशुपतिनाथ की प्रतिकृति सिंहस्थ-2016 में लाई गई है। भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन के लिए प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु पहुँच रहे हैं। पशुपतिनाथ की प्रतिमा साढ़े सात फीट गुणा साढ़े तीन फीट की है नेपाल के काठमाण्डू में साढ़े तीन फीट ऊँची प्रतिमा है।

अष्टमुखी भगवान पशुपतिनाथ की प्रतिमा की प्रतिकृति साधु-संतों की उपस्थिति में दत्त अखाड़ा क्षेत्र के बड़नगर मार्ग पर प्रतिष्ठापित की गई है। जिला प्रशासन मंदसौर के सहयोग से भगवान पशुपतिनाथ की बारह टन वजनी प्रतिमा क्रेन से लाई गई है। यहाँ एक लघु रजत प्रतिमा भी प्रतिष्ठापित की गई है। यहाँ प्रतिदिन अभिषेक एवं पूजा-अर्चना के सभी कार्य विधि-विधान से होते हैं।

उल्लेखनीय है कि मंदसौर में भगवान पशुपतिनाथ की यह विशिष्ट प्रतिमा शिवना नदी से प्राप्त हुई थी। प्रतिमा की 60 के दशक में प्राण-प्रतिष्ठा की गई और मंदसौर श्रद्धा का केन्द्र बना। भगवान पशुपतिनाथ महादेव सिंहस्थ सेवा समिति, मंदसौर के पंडित दुर्गाशंकर शास्त्री जोशी और उनके परिजन के साथ ही मंदसौर के श्री भंवरलाल भाटी भगवान पशुपतिनाथ की सेवा का कार्य कर रहे हैं।

कला-उत्सव के दूसरे दिन नयनाभिराम प्रस्तुतियाँ
 
भोपाल : रविवार, अप्रैल 24, 2016, 18:26 IST
 

सिंहस्थ में उज्जैन शहर के 6 स्थान पर कला-उत्सव के दूसरे दिन भारत की बहुआयामी सांस्कृतिक विरासत की मनोरम, भव्य और नयनाभिराम प्रस्तुतियाँ हुई। भरतमुनि मंच, कालिदास मंच, विक्रमादित्य मंच, भोज मंच, भर्तृहरि मंच और त्रिवेणी संग्रहालय में गायन, वादन, नृत्य और रंग-प्रस्तुतियों का बड़ी संख्या में दर्शकों ने देर तक रसास्वादन लिया।

भरतमुनि मंच पर सुविख्यात भजन गायक पण्डित रतनमोहन शर्मा के गायन से शुभारम्भ हुआ। संगीत मार्तंण्ड पण्डित जसराज के भतीजे पण्डित रतन ने सिंहस्थ के अवसर पर तैयार की गई विशिष्ट वंदनाओं का गायन किया। उनकी शिव और राम पर केन्द्रित भक्ति रचनाओं ने समा बाँधा। उनके गायन में संगीत की संस्कार सम्मत रागदारी की छाप स्पष्ट दिखाई दे रही थी। इसके बाद अहमदाबाद की विख्यात गायिका सुश्री विराज अमर का गायन हुआ। उन्होंने राग झिंझोटी में द्रुत एवं मध्य-लय में अनेक रचनाओं का गायन किया। उनके स्वर-माधुर्य से श्रोता बहुत प्रभावित हुए। गायन के बाद रामलीला के प्रसंगों में राम-जन्म, ताड़का वध एवं अहिल्या उद्धार प्रस्तुत किया गया। जबलपुर की कलाकार सुश्री नीलांगी कालंतरे के कथक नृत्य और सागर के मनीष यादव ग्रुप ने बरेदी लोक नृत्य की प्रस्तुति दी।

त्रिवेणी संग्रहालय में शनिवार को सुप्रतिष्ठित लोकगायक श्री गयाप्रसाद प्रजापति के लोकगायन से शुभारंभ हुआ। इसमें इन्दौर के सुविख्यात बाँसुरी वादक श्री सलिल दाते का बाँसुरी वादन हुआ। त्रिवेणी संग्रहालय में अंतिम प्रस्तुति उज्जैन शहर के युवा गायक श्री लोकेन्द्र सिंह के गायन की हुई।

कालिदास मंच पर कला-उत्सव की शुरूआत श्री अवनीश मिश्रा के वैदिक मंत्रोच्चार से हुई। इसके बाद अनुराधा पाल मुम्बई के एकल तबला वादन एवं नई दिल्ली की युवा नृत्यांगना सुश्री संजीनी कुलकर्णी के कथक नृत्य की प्रस्तुति हुई। समापन भोपाल के सुप्रतिष्ठित रंगकर्मी श्री गोपाल दुबे के नाटक-पार्क के मंचन से हुआ।

भोज मंच पर छत्तीसगढ़ की सुप्रतिष्ठित लोक गायिका श्रीमती रेखा देवार के भर्तृहरि गायन से कला-उत्सव का प्रारंभ हुआ। बस्तर की मुरिया जनजाति के लोक कलाकारों ने गेढ़ी नृत्य की प्रस्तुति दी। अगली प्रस्तुति केरल के सिंगार मेलम नृत्य एवं आंध्रप्रदेश के गर्गलू नृत्य की हुई। छत्तीसगढ़ का पंथी लोक नृत्य, कर्नाटक राज्य का वीरगासे नृत्य, प्रसिद्ध पण्डवानी गायिका सुश्री शांतिबाई चेलक द्वारा द्रोपदी चीर हरण की प्रस्तुति, पुडुचेरी के अनुष्ठानिक नृत्य कालीअट्टम, तमिलनाडु का डमी हॉर्स, करगम नृत्य की प्रस्तुतियाँ हुई।

भर्तृहरि मंच पर कला उत्सव की शुरूआत राजेन्द्र काचरू एवं शेवती सान्याल के भक्ति पद गायन से हुई। राजस्थान का कालबेलिया नृत्य, हरियाणा का होली नृत्य, कश्मीर का तेरा ताली नृत्य, बूमरो, उत्तराखण्ड का गढ़वाली नृत्य एवं पंजाब का अखाड़ा एवं मार्शल आर्ट का प्रदर्शन किया गया।

विक्रमादित्य मंच पर कला-उत्सव का आरंभ छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध लोक नृत्य एवं लोकगायन से हुआ। जबलपुर की सुप्रतिष्ठित भक्ति संगीत गायिका सुश्री तापसी नागराज का गायन भी हुआ।

कुम्भ और मोहिनी का सच
 
भोपाल : रविवार, अप्रैल 24, 2016, 18:31 IST
 

समुद्र-मंथन की कथा से हमारा और हमारी स्मृति का परिचय बहुत पुराना है। भक्त कवियों, तांत्रिकों और तमाम सारे साहित्य में देह को कुम्भ कहा गया है। हमारी ज्ञान-परम्परा समुद्र का मंथन रचती है। देह और धरती के अनुपात में जल और मिट्टी का अनुपात एक जैसा है। सत्य को संरक्षित करने की यह अप्रतिम विधि और उसके रहस्य का उदघाटन हम लगभग भूल चुके हैं। कथा के शब्दार्थ के बजाय उसके पीछे के अर्थ को जानना और जानने की इच्छा रखना ही अपने पूर्वजों के प्रति वास्तविक श्रद्धा और सम्मान है। मंथन के कथा अभिप्राय में मदरांचल रूपी मद यानी अहंकार को आधार बनाने, वासुकि रूपी वासना को रज्जु यानी रस्सी बनाने और जीवन की उत्कट इच्छा के प्रतीक रूप में कछुए के प्रतीक से यदि अपने भीतर सच और झूठ के द्वन्द से मंथन किया जायेगा, तो यह सुनिश्चित है कि हमारे भीतर का सभी हलाहल (विष) बाहर होगा। हमें क्रमशः वे सभी रत्न वैभव, बल, गति, सुगन्ध, सौन्दर्य, धन, ऐश्वर्य, नाद और इच्छा प्रतिपूर्ति के समस्त साधन हमारी पात्रता अनुसार मिलते हैं। यदि हमने ठहरना सुनिश्चित न किया, तो अन्तिम रूप से अमृत प्राप्त होगा ही। अमृत प्राप्त होने का अर्थ ही है कि जीवन-मृत्यु के चक्र से परे देव योनि, जो प्रत्येक जातक के जन्म का प्रयोजन है, वह प्राप्त होगी।

इस सुन्दर कथा में एक बहुत बारीक सत्य सांकेतिक रूप से अभिव्यक्त है। भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण कर अमृत का सम्यक विभाजन करते हैं। यह कैसे सम्भव है कि भगवान विष्णु से छिपकर कोई असुर अमृत का पान कर सके। असुर हमेशा सुर की यात्रा के लिए उपयोगी है। बिना उसके अमृत प्राप्त किया नहीं जा सकता। इसलिए शायद प्रतीकात्मक रूप से राहू को अमृत देकर भगवान विष्णु हमारे साथ ही असुर को भी हमारे ही कल्याण के लिए अमरत्व का वरदान देते हैं।

समुद्र-मंथन की कथा के संज्ञान से व्यक्ति अपने भीतर के मंथन की यात्रा भले न कर सका हो, पर इतना तो घटित हो ही गया है कि सदियों से हम इस कथा के बहाने जल, जीवन, सामुदायिकता, परस्पर सौहार्द प्रकट करने पवित्र स्थलों पर एकत्र होते हैं। ज्ञानियों और सिद्धों का आशीष प्राप्त करते हैं। अपनी जिज्ञासाओं के समाधान हम महाकुम्भ में पधारे आचार्यों से प्राप्त करते हैं। इतना भी प्रयोजन किसी मंथन से प्राप्त हुए अमृत से कम नहीं है।

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